अभी तक बस दूसरों के समस्या का ही निदान करता रह गया लेकिन उम्र बढ़ने पर होने वाली खुद की समस्या पर कभी विचार ही नहीं किया आज उम्र के इस पड़ाव पर समझ में आ रहा है कि यहां सब अपने लिए ही सोचते हैं दूसरों के लिए कोई संवेदना नहीं होती है बस इसीलिए खुद के बारे में सोचते हुए एक समझदार और संस्कारी साथी की जरूरत महसूस कर रहा हूं जाति से मुझे कोई समस्या नहीं है बस उम्र भर सुकून से साथ देने का भरोसा चाहिए
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